“कुश की कलम”

मुसीबतों में भी लोगो को आशा की किरण नज़र जाती है.. देखिये ना हमारे घर के सामने करीब सौ सालो से जिन्दा एक महिला की मृत्यु हो गयी.. पता चला बीमार थी लेकिन मौत नहीं रही थी तो घर वालो ने उसे मुक्ति देने के लिए ४६ डिग्री टेम्प्रेचर में बिना पंखे वाले एक कमरे में सुला दिया.. बुढ़िया को रातो रात मुक्ति मिल गयी.. कल शाम को उस कमरे की खिड़की पर कूलर लग गया.. अब उसमे छोटा पढाई करेगा.. मेरे मोबाइल पर गाना बज रहा है.. “ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है..” नहीं प्यासा का नहीं, गुलाल का है.. पुरानो की अब वेल्यु नहीं रही.. मैं पूरी रात इस घटना पर करवटे बदलता रहा..

दिसम्बर का महिना मैं अपने दोस्त के पिताजी की डेथ के बाद उस से मिलने गया.. डेथ के सात दिन बाद पहुंचा घर पर कुछ काम चल रहा था.. दीवार बनायीं जा रही थीदुबई से छोटेवाले चाचा जी आये है अगले सप्ताह उनकी फ्लाईट है.. इसीलिए.. काम जल्दी हो रहा है… स्टार वन पर एक प्रोग्राम रहा है.. “दिल मिल गए.. ”

एक महिना पहले मैं अपने जूते पोलिश करवा रहा था एक पंद्रह सोलह साल का लड़का था.. इतने में एक आदमी आया पोलिश वाले ने उसको कुछ रूपये दिए मैंने पुछा क्या है तो बोला ब्याज पे पैसे लिए है.. थोडी देर बाद वो बोला अब ऐसे हालात नहीं रहेंगे.. बस पंद्रह दिन की बात है फिर हमारे पास भी गाडी होगी.. बहुत जल्द मैं करोड़पति बनने वाला हूँ.. मैंने पुछा कैसे? तो बोला अहमदाबाद में किसी में माता आई है.. वहा पर कुछ भी ले जाओ वो सोना बन जाता हैतीन दिन पहले देखा वो अभी भी वही जूते पोलिश कर रहा था.. मेरी हिम्मत नहीं हुई उसके पास जाने की.. सड़क के उस पार मंदिर के जीर्णोद्वार के लिए चंदा इकठ्ठा किया जा रहा है..

किसी ऑफिस के बाहर बैठा गार्ड अपनी लाचारी को तौलिया सर पे रखे ढो रहा है.. सूरज उसको दादागिरी दिखा रहा है.. मैं ऊपर देखता हूँ.. और पूछता हूँ हिम्मत है तो सी वालो को दिखाओ ये गर्मी.. वो मेरी बात का जवाब नहीं देता पर शाम को थोडी बारिश होती है.. शुक्र है थोडी तो गैरत है सूरज में.. अगले दिन सुबह ऑफिस आता हूँ मेरा सी खराब है.. खिड़की से बाहर देखता हूँ सूरज मुस्कुरा रहा है.. कितना इगो होता है ना लोगो में.. ?

रात के बारह बजे मैं फोन पर किसी से लड़ रहा हूँ.. उस गार्ड की खातिर जो सर पे तौलिया रखे बैठा है.. कूलर क्यों नहीं दे देते उसको..? मुझे जवाब मिला है.. गार्ड का काम ही वही है.. उसको कूलर कैसे दे सकते है.. बी प्रेक्टिकल..! रात बीत चुकी है सुबह सुबह मेरा होंकर पूरी दुनिया को बण्डल में बाँध के फेंकता है.. मैं चाय बनाने के लिए दूध गर्म करता हूँ.. अखबार में खबर है.. डेढ़ साल की बच्ची का बलात्कार.. मैंने दूध पूरा वाश बेसिन में डाल दिया है

आज रात को फोन पर फिर से वही जवाब मिला हैबी प्रेक्टिकल…. गुलाल का गाना अभी भी बज रहा है.. जैसी बची है वैसी की वैसी बचा लो रे दुनिया…

जितनी शिद्दत से मैं मंदिर के सामने से गुज़रते वक़्त सजदा करता हूँ उसी भावना से किसी मस्जिद पर भी सर झुकाता हूँ.. गुरूद्वारे और चर्चो पर भी इसी तरह की एक प्रक्रिया स्वत: ही हो जाती है.. और यकीन मानिए इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है.. ये बिलकुल सहज है..

दरअसल हम भारतीय बहुत ही भावुक होते है.. अपनी रूट से जुड़े हुए.. हमने पश्चिम को भी अपनाया और अपनी संस्कृति भी नहीं छोडी.. लेकिन सिक्के का एक पहलु देखकर ही कुछ भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता…

मैं मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर जाता हूँ और कभी कभी शनिवार या रविवार को किसी पब टाइप जगह पर चला जाता हूँ.. रोज़ सुबह मेरा हनुमान चालीसा का पाठ क्या इतना कमज़ोर है कि मेरे कभी कभी पब जाने से टूट जायेगा.. क्या मैं भारतीय नहीं रहूँगा?

शादी की पार्टी में सब लड़के लड़किया इंग्लिश में बाते कर रहे थे इतने में उनके मामाजी गए.. सब बच्चे उनके पैर छु रहे है.. एक मिनट पहले इंग्लिश में बोलने वाले ये बच्चे अब पाँव छु रहे है ये बच्चे भारतीय है या विदेशी?

मैं एक विदेशी कंपनी का लैपटॉप लेकर आता हूँ और उस पर मेरी बहन कुमकुम से टीका करती है.. नयी गाडी खरीदी गयी है तो सबसे पहले वो गणेश जी के मंदिर जायेगी.. अगर गणेश जी के मंदिर के बाहर खड़ी गाडी विदेशी कंपनी की है तो क्या हम विदेशी है ?

अगर विदेशो में महात्मा गांधी को गान्धू कहा जाए या फिर पंडित राम कृष्ण परमहंस को परमू कहा जाए या फिर विवेकानंद को नंदू कहा जाए तो कैसा लगेगा? हम लोग उन्हें गरियाएंगे या फिर दंगे फसाद करेंगे.. लेकिन दुसरे देश के किसी संत का नाम बिगाड़ने से परहेज नहीं करेंगे.. संत वेलेंटाईन को बाल्टियान या कुछ और कहना उचित लगता है? किसी संत का नाम बिगाड़ना क्या भारतीयता है ?

मुझे होलीवूड की फिल्मे पसंद है मैं देखने जाता हूँ साथ ही मैं हिंदी फिल्मे भी देखता हूँ.. मुझे ब्रायन एडम्स अच्छा लगता है तो मुझे कैलाश खैर का सूफियाना अंदाज़ भी पसंद है.. जितना मुझे डेल कार्नेगी या स्टीफन कोवे पसंद है उतना ही मुझे रघुरमन या श्री धरन पसंद है..

पिज्जा हट या बरिस्ता में बैठकर कॉफी पीने में जो मजा आता है वो ही अन्ना की थडी पर बैठकर कटिंग पीने में या फिर अपने दिलबहार की पपडी चाट खाने में आता है..

हम भारतीय लोग हर नयी चीज़ का स्वागत करते है.. पर अपनों को भूलते नहीं है.. अंकल आंटी के साथ जी लगाना इसी भारतीयता का परिचायक है.. हम तो एक्सक्यूज मी के साथ भी भाईसाहब लगा देते है..

ये हम लोगो की ताकत ही है की हमने मेक्डोनाल्ड को मजबूर किया आलू टिक्की बर्गर बनाने के लिए.. पिज्जा हट में पंजाबी पिज्जा भी मेनू में गया है.. स्टार चैनल को यहाँ पर अपने हिंदी चैनल शुरू करने पड़े.. यहाँ तक की माइक्रोसॉफ्ट और गूगल भी हिंदी पर उतर आये.. यही है अपना इंडिया..

तो फंडा ये है कि हमारे द्वारा पहने गए कपडे या बोली हमें परिभाषित नहीं करती.. ज़रूरी है मन का भारतीय होना.. अगर कोई आकर के हमसे पता पूछ ले तो आज भी हम लोग बड़ी आत्मीयता से पता बताते है.. पानी पिलाते वक़्त हथेली पर गिलास रखते है.. खाना बनाते वक़्त गाय की रोटी अलग निकाली जाती है.. मंगलवार के व्रत अभी भी ख़त्म नहीं हुए.. एक्जाम्स टाईम्स पर अब भी भगवान् का कंप्यूटर हैंग हो जाता है.. काजल का टीका तो अब भी बच्चो के गालो पर लगा होता है.. खाने के बाद पान आज भी हमारी फर्स्ट चोइस होती है.. हाथो पर बंधी रोलिया अब भी दुआओ से सरोबार होती है.. शुभ काम पर आज भी सबसे पहले श्री गणेश लिखा जाता है.. अब भी क्रिकेट की आखिरी बाल तक एक टांग पे टांग रख के बैठे रहते है.. भले ही हम कितना भी मॉडर्न हो जाये पर दिल तो आख़िर हिन्दुस्तानी ही रहेगा..

पचास की स्पीड से चलती मेरी गाडी के सामने से गुजरते ही एक साईकिल वाला ब्रेक लगाता है और रुक जाता है.. ये वो कन्डीशन है जब मुझे सबसे ज्यादा दुःख होता है.. मैं हमेशा कोशिश करता हूँ कि कोई साईकिल वाले को ब्रेक नहीं लगाना पड़े.. क्योंकि मैं तो एक्सीलरेटर दबा कर स्पीड बढा लूँगा पर उसे वक़्त लगेगा.. अब मेरे साथ बैठने वाले मेरे दोस्त और कजिन्स भी इस बात को जानते है और वो भी इस रुल को फोलो करते है..

अपना ख्याल तो हम रखते ही है बस कभी कभी दुसरो के बारे में भी सोच लिया जाये तो लाईफ भी ईस्टमैन कलर की हो जाये.. और ज्यादा कुछ तो करना ही नहीं है.. बस छोटी छोटी सी बाते.. जैसे..

आप किसी मॉल से निकल रहे है.. पार्किंग में खड़ी आपकी गाडी निकलवाने के लिए बुढा चौकीदार भी मिल सकता है.. उस से सिर्फ इतना कह दीजिये ‘आज गर्मी बहुत ज्यादा है.. ‘ यकीन मानिए वो मुस्कुरा उठेगा.. आप तो बोल के निकल जायेंगे लेकिन वो काफी देर तक मन ही मन मुस्कुराता रहेगा..

लिफ्ट मैन से मै हमेशा बात करता हूँ.. जब भी लिफ्ट में जाता हूँ मै लिफ्ट मैन से कहता हूँ ‘यार इसमें गाने वाने नहीं चलते क्या बोर हो जाते होंगे तुम तो.. ‘ वो मुस्कुरा के कहता है ‘साहब ये तो काम है अपना..’ ये कहते हुए उसके चेहरे के जो भाव होते है वो मुझे बहुत अच्छे लगते है.. इतना तो आप कर ही सकते है..

परसों मैं किसी का वेट करते हुए एक बिल्डिंग के बाहर खडा था तभी उसी बिल्डिंग की तरफ एक रिक्शा में लड़की आई वो उससे कुछ बात कर रही थी.. नीचे उतर कर लड़की ने कहा ‘अच्छा भय्या.. थैंक यु.. ‘ रिक्शा वाले ने कहा ‘शुक्रिया फिर आइयेगा’ हालाँकि ये शब्द उसने बहुत धीरे कहे थे जो लड़की ने नहीं सुने पर मैंने सुन लिए थे.. धीरे कहने के पीछे उसकी वजह शायद ये रही हो की थैंक यु के बाद क्या कहा जाये उसे पता नहीं हो.. लेकिन ऐसा कहते वक़्त मैंने उसके चेहरे पर ख़ुशी के भाव देखे.. वो मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गया.. शायद बार बार उसके कानो में ये शब्द गूंजे भी हो..

आप कभी कभी शूज बाहर से पोलिश करवा लीजिये.. और हर बार अलग जगह से ताकि सब बराबर कमाए.. जब वो शूज पोलिश कर रहा हो तो उस से सिर्फ ये कहिये ‘यार आप पोलिश अच्छी तरह से कर रहे हो बाकी लोग ऐसा नहीं करते..” उसके चेहरे पर आयी मुस्कान आप साफ़ साफ़ पढ़ सकते है.. अब अगर वो अच्छी पोलिश नहीं भी कर रहा होगा तो करेगा.. यही बात आप हेयर कट लेते समय भी कह सकते है.. आपकी गाडी की सर्विस करते समय.. हर उस वक्त जब कोई आपके लिए मेहनत कर रहा हो.. मैंने तो कल शाम ही मेरे यहाँ आये डिश टी वी के इंस्टालर से ये कहा था..

अगर आपकी शादी हो चुकी है और अब आपकी मम्मी खाना नहीं बनाती तो आज मम्मी से कहिये.. मम्मी आज दाल आप बनाओ ना.. मम्मी तो हमेशा से ही अच्छी दाल बनाती है पर आज जो आपका विश्वास होगा मम्मी के लिए उस दाल का जायका ही कुछ अलग होगा.. ऐसा ही आप अपनी पत्नी से भी कह सकते है.. सिर्फ इतना कहिये उनसे ‘ सुनो आज दाल में क्या मिलाया था ? बहुत अच्छी बनी…’ यकीन मानिए अगले दिन की दाल का स्वाद ही कुछ और होगा..

जितनी ख़ुशी आपको ये सब करने से मिलेगी उतनी ही सामने वाले को भी होगी.. और इन सबके लिए कुछ भी एक्स्ट्रा नहीं करना है.. जेब से एक पैसा खर्च नहीं होगा..

बड़ी ख़ुशी से अच्छा है छोटी छोटी खुशिया बांटते चले.. इसीलिए तो कहता हूँ खुशनुमा हो जाओ यारो..

अब चलते चलते मदर्स डे की बयार में अपना लिखा कुछ बाँट लेता हूँ आपसे..वैसे साल में सिर्फ़ एक दिन माँ का नही होता.. हर दिन माँ का होता है.. इसी तर्ज़ पर आज समर्पित है कुछ शब्द माँ के लिए..

उम्मीद बुझने वाली है
मगर जाने कौनसा
तेल डाल रखा है..
लौ बूझने का नाम ही नही लेती
हर थोड़ी देर बाद
और भड़क जाती है..

शायद जवान बेटे का इंतेज़ार करती
मा की आँखें होगी….

पड़ोस के घर में
लड़का हुआ था…लड्डू
आए थे घर में
पूरे चार लड्डू थे..
लेकिन घर में हम पाँच
अचानक एक आवाज़ आई
मुझे तो लड्डू नही
खाना… मैं
जानता हू वो माँ ही थी…

हमेफोन उठाते ही आवाज़ आई क्रिकेटर ले लो.. क्रिकेटर ले लो.. हम बौखलाए.. भाई ये क्या है.. नयी रिंगटोन. नया फोन.. और लोन के लिए तो फोन आते थे ये अब क्रिकेट का क्या चक्कर है. हमने पूछा भय्ये माज़रा क्या है.. क्या बक बक कर रहे हो..? वो बोला देखिए श्रीमान मैं तमीज़ से बात कर रहा हू और आप इसे बक बक कह रहे है.. आप नही जानते आप कितने भाग्यशाली है की मैने आपको फोन किया है.. अमा क्रिकेटर्स की नयी टीम बन रही है.. आप भी खरीद लीजिए. फ़ायदा ही फ़ायदा है..

पहले सरस्वती जी के सुर होते थे अब माता लक्ष्मी की ताल होती हैफ़ायदा ! हिन्दुस्तानी आदमी के लिए इस से बढ़िया शब्द क्या हो सकता है.. और हम भी ठहरे पक्के हिन्दुस्तानी.. सो हमने कहा बतलाओ जी कैसा फ़ायदा.. वो खुश होकर बोला.. अजी आप रातो रात स्टार बन जाओगे.. कैमरा मैदान पर खिलाड़ियो से ज़्यादा आप पर रहेगा.. आप आगे आगे खिलाड़ी पीछे पीछे.. इतना सुनते ही हमने ख्यालो की तलैया में डुबकी मार ली..और स्टेज पर दो चार ठुमके लगा लिए.. वो बोला ये तो कुछ नही है सर.. नाचने गाने का पूरा मौका है.. बड़ी बड़ी म्यूज़िक कंपनिया स्पोंसर कर देगी. एक पॉप अलबम बनाओ और पूरी टीम के खिलाड़ियो के साथ ठुमके लगाओ.. हमने पूछा खिलाड़ी ओर ठुमके..? वो तो खिलाड़ी है उनका काम तो खेलना है.. वो हमारी अज्ञानता पर मुस्कुराया. और बोला क्या साहब आप भी..? आजकल तो जिसे देखो वो ठुमका लगा रहा है.. समय बदल रहा है सर पहले सरस्वती जी के सुर होते थे अब माता लक्ष्मी की ताल होती है और सब बस उसी ताल पर बेताल नाचते रहते है.. खिलाड़ी हो या नेता कोई फ़र्क नही पड़ता..

हम अपनी इस अज्ञानता पर बहुत लज्जित हुए.. हमे लगा जैसे हम कौनसी दुनिया में जी रहे है.. बाहर इतना सब हो रहा है ओर हमे पता ही नही.. हमने कहा लेकिन भैया खाली खिलाड़ी के आगे चलना ओर ठुमके लगाने से क्या होगा.. इसमे भला क्या मज़ा है.. वो हंसा और बोला क्या सर आप भी..? दुनिया मेट्रो ट्रेन में भाग रही है ओर आप है की साइकल रिक्शा में बैठे है.. अरे जनाब पैसा और क्या.. ? टीम जीती तो आपको पैसा मिलेगा.. टिकट बिके तो आपको पैसा मिलेगा.. उनके हेल्मेट पे स्पॉंसर का एड दे सकते हो.. बैट पे दे सकते हो.. ग्लव्स पे दे सकते हो.. यहाँ तक की उनके चड्डी बनियान पर भी एड दे सकते हो आप.. अजी क्रिककेटर खरीदा है आपने.. कोई मामूली बात थोड़े ही है..

हम बड़े खुश हो लिए.. भाई बात तो तुम्हारी ठीक है.. अच्छा अब ज़रा सौदे की बात भी कर ले.. ये बताओ क्या भाव दिए क्रिकेटर..? उसने कहा वैसे तो बाज़ार बहुत गर्म है..ये बताओ क्या भाव दिए क्रिकेटर..? पर क्योंकि आप मुझे भले आदमी लगते है इसलिए आपको डिसकाउंट दूँगा.. आप ऐसा करो की सौ की कीमत है पर आप चाहो तो नब्बे दे दो.. हमने कहा अरे कैसी बात करते हो बंधु.. पुर सौ लो..दस रुपये के लिए क्या सोचना.. इस बार वो ज़ोर से हसा क्या अंकल आप भी मज़ाक बहुत करते हो.. मैं सौ रुपये नही सौ करोड़ की बात कर रहा हू…. सौ करोड़ !!!!!!!! हमने छाती पे हाथ रखकर अटैक को आने से रोका.. और बोले भय्ये सौ करोड़? अबे तू आदमी है या घनचक्कर.. तुम क्या दुनिया को बेवकूफ़ समझते हो की कोई इतनी महँगी टीम खरीदेगा..

वो फिर मुस्कुराया और बोला सर आप बहुत भोले हो.. सारी टीम बिक गयी है बस एक बची है.. आप जल्दी से बता दो वरना मैं किसी और को फोन लगाऊँगा.. हमने अपना घर बार सबकी कीमत लगाई तो ही बीस लाख से ज़्यादा नही हुआ.. टीम कहा से खरीदते…? हमने कहा बाबू साहब मेरे पास तो इतना रुपया नही है.. वो फिर ज़ोर से हंसा और बोला सर क्यो मज़ाक करते हो आपके पास पैसा नही होगा तो फिर किसके पास होगा.. आप तो इतने बड़े आदमी है.. हम सकपकाए और बोले भैया बड़े सड़े कुछ नही हम तो मामूली आदमी है बॅंक में नौकरी करते है.. वो चौंक गया बोला लेकिन आप तो मशहूर अभिनेता हृतिक कुमार है.. हम बोले भैया कहा हृतिक कुमार और कहा हम.. लगता है आपने रॉंग नंबर मिलाया है..

और सामने से खट्ट की आवाज़ आई.. शायद सुबह से बोनी नही हुई थी उसकी

तारीख १३ अक्टूबर २००५ समय शामबजे

मैंने पापा के कमरे में जाकर कहा जयपुर जा रहा हूँ.. अब वही जॉब करूँगा..
पापा ने पुछा कब ?
मैंने कहा अभी .३० बजे की ट्रेन है..

मेरे दोस्त मुझे छोड़ने आये थे ट्रेन चल चुकी थी मैं अपने दोस्तों के साथ भाग रहा था प्लेटफोर्म पर.. वो ट्रेन एक स्टेबिलिटी थी.. आखिर पकड़ में ही गयी.. शहर बदला.. लोग बदले.. माहौल बदला.. मुझे लगा अब कुछ बदलेगा.. और बदला भी..

अब देर रात जब घर आता हूँ तो जूते पहने हुए ही आता हूँ.. पहले तो गेट के बाहर जूते उतार कर धीरे धीरे दरवाजा खोलकर अन्दर आता था जैसे ही अन्दर घुसता.. मम्मी की आवाज़ आती.. गया तू .. इतनी देर कहाँ लगायी? अब तक का रिकोर्ड है मम्मी का, कभी ऐसा नहीं हुआ कि मेरे आने से पहले मम्मी सोयी हो.. इतने कम डेसिबल की आवाज़ सुनने की खूबी प्रक्रति ने सिर्फ मांओं को ही दी है..

मेरी आदत थी रात को गाने सुनते हुए सोता था.. मैं गाने चलाकर छोड़ देता था सुबह मुझे म्यूजिक सिस्टम ऑफ़ मिलता.. आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि सुबह उठने के बाद मुझे म्यूजिक सिस्टम बंद करना पड़े.. अब रात को टी वी चलाते ही सबसे पहले उसमे टाइमर लगाता हूँ.. कहते है बच्चे घर को रौशन रखते है क्योंकि वो घर की बत्तिया बुझाना भूल जाते है..

ये सब्जी मुझे अच्छी नहीं लगती मैं नहीं खाऊँगा.. और मम्मी दूसरी सब्जी बना देती थी.. और अब अगर चावल कच्चे भी हो तो मैं खा लेता हूँ सोचता हु इतनी गर्मी में दोबोरा कौन एक सी टी और लगायेगा.. झंकार बीट्स फ़िल्म का एक डायलोग है… ‘ दुनिया गोल है और हर पाप का एक डबल रोल है ‘

मम्मी के खाना बनाते वक़्त मैंने कभी मम्मी के सर पर जमी पसीने की बूंदों पर गौर नहीं किया.. सोचता हूँ कितनी बार मैंने कहा होगा खाना अच्छा नहीं बना.. कितनी बार मैंने थाली में खाना छोडा होगा.. अब मम्मी तो खाना बनाती नहीं है पर जब भी घर जाता हूँ भाभी के बनाये खाने की जम कर तारीफ़ करता हूँ.. मैं उनके लिए इतना तो कर ही सकता हूँ..

बहुत कुछ बदल गया है आस पास की जिन लड़कियों के साथ बचपन में खेलते थे अब उनसे बात करना तो दूर सामने देख पाना भी नहीं होता.. सो कोल्ड सोशल वेल्यु की गर्माहट दोस्ती को पिघला देती है..

और भी तो बहुत कुछ बदला है.. अब बरसातो में बाईक उठाकर झरनों पर नहीं जातेअब रात को प्लान बनाकर सुबह शहर से बाहर घूमने नहीं जाते.. अब सब पैसे इकट्ठे करके क्रिकेट की बोंल नहीं लेकर आते.. अब दोस्तों से गानों की केसेट्स और कोमिक्स एक्सचेंज नहीं की जाती.. अब चाय की थडी पर दो की तीन नही होती

अब सचिन के सिक्सर पर दोस्त लोग एक साथ उछलते नहीं है.. अब होसटलर्स दोस्तों के कमरों में गर्ल फ्रेंड्स के दिए गिफ्ट नहीं रखे जाते.. अब दोस्तों के लिए होकीया नहीं निकाली जाती.. अब गली की सबसे खडूस आंटी से बोंल के लिए झगडा नहीं होता है.. अब एक ही दोस्त का साल में तीन बार बर्थडे नहीं होता.. अब कोईतेरी भाभी हैनहीं बोलता.. अब तीन बार फोन की घंटी बजना कोडवर्ड नहीं होता.. अब केल्शियम का एटोमिक नंबर याद करने में रात नहीं गुजारनी पड़ती है..

बहुत कुछ तो है जो अब नही होता..

अनुराग जी से स्टाइल उधार लेते हुए एक त्रिवेणी..

“ख़ुशी का, खुमार का, थोड़े से प्यार का
एक एक कर सारे रंग छूट गये..

ज़िंदगी अब पुरानी जीन्स लगती है..”

लाईफ की छुपम छुपाई..

Posted by: bhaikush on: अप्रैल 14, 2009

जिंदगी कब लाईफ बन गयी पता ही नहीं चला.. अभी थोडी देर पहले ही तो बचपन मुझे जवानी के घर छोड़ने आया था.. तब जो जीते थे, जिंदगी तो वही थी.. अब जो है उसे तो लोग बाग़ लाईफ कहते है.. पर फर्क दोनों में कुछ भी नहीं.. पहले हम इससे खेलते थे अब ये हमसे खेलती है.. ज़िन्दगी का फेवरेट गेम छुपम छुपाई..

छोटा था तब सब छुपम छुपाई खेलते थे.. जब भी मेरी डेन होती मेरा बड़ा भाई कहता इसकी जगह मैं जाऊंगा.. और मैं बच जाता.. स्कूल से लौटते वक़्त भी अपना बस्ता उसी के कंधे पर होता था.. और कभी कभी तो मैं भी..

घर में छुपम छुपाई खेलते वक़्त उसे पता होता था कि मैं कहा छुपा हूँ.. पर फिर भी वो न ढूंढ पाने की ऐक्टिंग करता.. और तो और उसको मुझपे इतना भरोसा था वो अपनी गर्ल फ्रेंड से मिलने वाले गिफ्ट्स भी मुझसे छुपा कर मेरे स्कूल बैग में रखता.. उसे पता था मैं इसको कभी खोल कर नहीं देखूंगा..

वो छुपम छुपाई तो पीछे छूट गयी अब तो लाईफ खेलती है छुपम छुपाई.. इस खेल के अपने नियम है.. सबको अपनी डेन खुद लानी पड़ती है

छुपी तो खुशिया बिलकुल हमारे सामने ही होती है पर हमें नज़र नहीं आती बस फर्क यही है कि इस बार हम ऐक्टिंग नहीं कर रहे होते है..

ऊपर वाला हमें भी तो जानता है अच्छे से.. सारी खुशिया उसने छुपा रखी है हमारे ही मन में बस खुद का मन खोल कर हम देखते ही नहीं ठीक वैसे ही जैसे मैंने कभी अपना स्कूल बैग नहीं खोला..

मज़े की बात है लाईफ की छुपम छुपाई में छुपी हुई कोई ख़ुशी पीछे से आकर थप्पी नहीं देती.. बस ढूंढते रहो.. जब तक मिल नहीं जाती..

अनुराग जी से थोडी सी स्टाइल उधार लेते हुए बहुत पहले लिखी अपनी एक त्रिवेणी आपके साथ शेयर कर रहा हूँ..

“खोया खोया सा रहता हू आजकल..
जबसे तुझे देखा है किसी और के साथ..

ज़िंदगी तू इतनी बद्चलन क्यो है..”

दस पैतालीस की आखिरी मेट्रो

Posted by: bhaikush on: अप्रैल 7, 2009

दस पैतालीस की आखिरी मेट्रो थी.. द्वारका से इन्द्रप्रस्थ की तरफ जा रहा था.. कैब आई नहीं थी तो मेट्रो ही लास्ट आप्शन था.. मैं ट्रेन में जाकर बैठ गया.. हाथ में राहेजा की किताबएनिथिंग फॉर यु मेम थी.’ मैं किताब पढ़ रहा था.. जनकपुरी स्टेशन आया ट्रेन रुकी और फिर चल पड़ी.. मुझे पता भी नहीं चलता ट्रेन में कौन चढा अगर वो आकर मुझे मेरे मोबाइल के बारे में नहीं बताती.. मेरा मोबाइल नीचे गिरा हुआ था..

थैंक्स “…मैंने कहा..
इट्स ओके ..

मुझे अजीब लगा पर वो मुझे देख रही थी.. ट्रेन में बहुत कम लोग थे और सब काफी दूर दूर बैठे थे.. जगह होने के बाद भी वो मेरे बगल में आकर बैठ गयी..

कहा जा रहे हो.. ? ” उसने पुछा..

मैं.. ! इन्द्रप्रस्थ..
और आप?

वहा तक जहा ये मेट्रो नहीं जाती..
मैं समझा नहीं..

समझदार लगते भी नहीं हो..
मतलब ?

देखा..! नहीं समझे मतलब इसी लिए कहा था..

मैं समझ नहीं पा रहा था वो क्या कह रही थी.. मैंने अपनी आँखे फिर किताब में घुसा ली..

क्या करते हो? वो बोली..
जी मैं कॉल सेंटर में काम करता हूँ..
अरे मैं भी तो वही करती हु..

आप ?
हा ऑर क्या तुम कॉल बॉय हो और मैं कॉल गर्ल..
व्हाट?
मेरे बिलकुल करीब एक कॉल गर्ल बैठी थी.. उसे देखकर ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगा था.. मुझे थोडी हिचकिचाहट हुई मैंने आस पास नज़र उठाकर देखा किसी की नज़र हमारी तरफ नहीं थी.. मैंने किताब बंद करके रख दी..

खुद को मुझसे कम्पेयर मत करो.. मैं तुम्हारी तरह नहीं हु..
क्यों ऐसा क्या अलग करते हो तुम? तुम्हारा क्या काम है ?
मैं फ़ोन पर, कस्टमर्स को होने वाली प्रोब्लम का सॉल्यूशन बताता हु..
तो मैं भी तो वही करती हूँ.. तुम्हारा काम भी ग्राहक को खुश रखना है और मेरा काम भी..

वेरी स्मार्ट..! लेकिन तुम जिसके लिए ये काम करती हो मैं उसके लिए नही करता..
मैं तो पैसे के लिए करती हूँ.. तुम किसके लिए करते हो?

मैं भी पैसो के लिए ही करता हूँ.. लेकिन…
लेकिन वेकिन क्या .. ही बताओ क्या फर्क है..

अरे कैसी बात कर रही हो .. हमारा काम सिस्टेमेटिक होता है.. हमारे टारगेट्स होते है जो हमें हमारा बॉस देता है.. हर महीने का एक टारगेट होता है..

अरे तो मैं तो यही करती हूँ.. तुम्हारा तो एक महीने का टारगेट है मुझे तो रोज़ का टार्गेट मिलता है.. ये जो मेरा पेट है ना रोज सुबह, इसको शाम तक भरने का टारगेट देता है.. मैं तो इसी के लिए काम करती हूँ.. यही मेरा बॉस है..

हुह.. मजाक अच्छा है ..
क्या करे.. मेरी लाइफ सबको मजाक ही लगती है..


नहीं मेरा वो मतलब नहीं था.. मैं समझ सकता हु दिल्ली जैसे शहर में कैसे सर्वाइव करते है.. मेरी शादी हो चुकी है पर अपना घर तक नहीं हैसच कहू तो हमारे जैसे लोगो का शादी करना आसान है पर घर.. घर बनाना बहुत मुश्किल.. तुमको नहीं लगता ?

बिल्कुल नही बल्कि हमारे जैसे लोगो के लिए घर बनाना आसान है पर शादी करना बहुत ही मुश्किल.. तुमको नहीं लगता ?

जिस तरह से जवाब दे रही थी.. मैं हैरत में था..

समझ सकता हूँ…. मेरी दोस्त बनोगी? मैंने कहा..
दोस्त ?
क्यों क्या हुआ?
पता नहीं.. पर इस वर्ड से कोई दोस्ती नहीं है मेरी.. दोस्त तो कई मिले पर सबको एक ही चीज़ चाहिए थी.. तुमको नहीं चाहिए ?

क्या?
या तो तुम बहुत बेवकूफ हो या फिर बहुत शातिर..!

अरे ये क्या बात हुई.. ठीक है मत बनो दोस्त..
नहीं नहीं ऐसा नहीं है.. चलो ठीक है दोस्ती पक्की..

ऑर उसने हाथ आगे बढाया.. उससे हाथ मिलाते ही एक अजीब सी सनसनी फ़ैल गयी.. अब तक तो ऐसी कोई फिलिंग थी नहीं पर उसका हाथ थामते ही एक अजीब सी बैचेनी होने लगी.. बहुत देर तक मैं चुप रहा.. बार बार हम दोनों की नज़रे एक दुसरे से मिल ही जाती थी..
अगला स्टेशन करोल बाग़ था.. गेट खुलते ही एक ठंडी हवा का झोंका अन्दर आया.. वो मेरे और करीब चुकी थी.. मैं नहीं जानता था मुझे क्या हो रहा है.. दो चार लोग और उतर गए थे..

कुछ बात है जो शायद तुम कह नहीं पा रहे हो.. वो बोली
नहीं ऐसी कोई बात नहीं..
अब जब दोस्त कह ही दिया है तो बोल दो..
सच में कुछ भी तो नहीं है..

जैसी तुम्हारी मर्ज़ी..

वो कैसे सब कुछ जानती थी थोडी ही देर में हम लोग उतरने वाले थे.. मैं कोशिश कर रहा था कि जितना जल्दी हो मैं उसे कह सकु..

वो मेरी तरफ मुडी और मैंने उससे कहा क्या तुम मेरे साथ….
उसका चेहरा थोडा बदल चुका था.. गले में एक हलचल देखी मैंने.. वो बोली
मगर तुमने तो मुझे दोस्त कहा था.. और तुम भी??
प्लीज मुझे गलत मत समझना.. तुमको देखकर एक ख्याल आया बस.. तुम भी चाहो तो कोई बात नहीं हमारी दोस्ती ऐसी ही रहेगी..

तुम्हारी बीवी भी तो है घर पे ?
हाँ है मगर..
मगर क्या ?
तुम नहीं समझोगी.. जाने दो..
हुह.. मैं सब समझ समझती हूँ डियर.
नहीं तुम मुझे गलत समझ रही हो मैं सिर्फ तुम्हारा दोस्त हूँ और दोस्ती के रिश्ते से ही चाहता हूँ.. मेरे लिए तुम कोई कॉल गर्ल नहीं हो..

वाह.. क्या बात कही है.. अच्छे घर के लगते हो ?
थैंक्स.. !
हुह.. मैंने कहा कुछ नहीं समझते हो..

वो सब छोडो तुम ये बताओ हाँ कि ना ? मैंने पुछा..
ठीक है.. अब जब दोस्त बोल ही दिया है तो ठीक है मगर एक बात याद रखना ये मैं पैसो के लिए नहीं कर रही हूँ..

जानता हूँ.. लेकिन कहाँ पर? ट्रेन में तो पोसिबल नहीं है..
ट्रेन नहीं डफर स्टेशन पर.. मंडी हाउस वाले स्टेशन पर..

उसके बाद जो कुछ हुआ वो तो तू जानता ही है.. और क्या बताऊ..
साले चैम्प तू नहीं सुधरेगा..तेरा रोज़ का है ये..
अबे सुधरने के लिए तो सारी ज़िन्दगी पड़ी है.. पर बिगड़ने की उम्र तो यही है.. देख ले आज ये निन्यानवे नंबर की थी.. बस इस शनिवार को सेंचुरी मार लेंगे..
तू भी साले पुरा कमीना है.. अच्छा ये बता उसका नंबर शम्बर लिया या नहीं कुछ हमारा भी भला कर देता..
नहीं यार उसने दिया नहीं.. पर मेरा नंबर उसने लिया है वो मुझे कर लेगी फोन..


बीप! बीप! बीप! बीप!

मेसेज आया लगता है..
देख तो कही उसी का तो नहीं..
देखता हु..
क्या हुआ बे.. क्या हुआ? कुछ बोलता क्यों नहीं? क्या लिखा है.. क्या हुआ?

तुम्हारे साथ वाली कल की रात.. बहुत ही बढ़िया थी.. ठीक वैसी ही जैसे आज से सात महीने पहले इसी ट्रेन में मुझे एक दोस्त मिला था.. जिसने मेरी दोस्ती का ग़लत फायदा उठाया.. और मुझे ये बीमारी दी .. उसके बाद से कई बार यहाँ आई हूँ.. उसके जैसे और भी मिलते है.. तुम भी मिले.. पता है तुम निन्यानवे थे.. इस शनिवार को सेंचुरी हो जायेगी…”

एक फिल्म नहीं मगर इसमें कुछ पात्र तो है क्या करे अगर वो काल्पनिक नहीं है तो.. नाम न ले.. इशारों में समझा दे.. उस दौर में चले जाये जब लोगो के पास भाषा नहीं थी इशारों इशारों में बाते होती थी.. नहीं मैं किसी प्रेमी युगल के बारे में बात नहीं कर रहा उनसे मुझे पूरी सहानुभूति है मैंने खुद भी कई बार अपने सीधे हाथ की ऊँगली को उल्टे हाथ की कलाई पर लगाते हुए फिर सीधे हाथ की उंगलियों से पांच बजाते हुए इशारे किये है.. मगर ये वो इशारा नहीं है.. नहीं नहीं ये बी इशारा भी नहीं.. जिनकी फिल्म कभी आपने देखी हो.. ये तो इशारों इशारों में होने वाली बातो की बात है..


क्या कहा आपको नहीं पता? हे संकट मोचन काहे ब्लोगर बनाया इनको?? ब्लोगर होकर भी यदि इशारों को नहीं समझो तो नालत है आप पर.. यहाँ पर इशारों इशारों पर पोस्ट लिखी जाती है.. इशारों इशारों में नाम ले लिया जाता है.. जिसको इशारा किया है वो इशारा समझ कर अपने ब्लॉग पर इशारा करने वाले की तरफ इशारा करते हुए पोस्ट लिख देते है.. देखिये न कैसे इशारों इशारों में बात हो जाती है और हम बूझ ही नहीं पाते की लफडा क्या था..

हालाँकि बूझने के मामले में हमारा भी कोई जवाब नहीं.. जब भी हम जोधपुर में अपने भाई बंधुओ के साथ होते है तो हमारा प्रिय खेल डम्ब शराज खेलते है.. ये खेल तो हमारे डा. अनुराग का भी फेवरेट है उन्होंने तो अपने साहबजादे आर्यन (अगला आमिर खान वही है.. क्या पता आमिर से दुगुना हो.. वो क्या है कि आजकल दुगुने का ही ज़माना है ) के जन्मदिन की पार्टी में भी बच्चो को डम्ब शराज ही खिलाया था.. नहीं नहीं खाने में नहीं जी.. ये तो खेल खिलाने वाला खाना है.. बाकी खाना तो बच्चो ने शानदार खाया था.. पर उसके विषय में फिर कभी.. हम डम्ब शराज पर आते है.. दो टीम बनती है हर टीम के एक बन्दे को दूसरी टीम का बंदा एक फिल्म का नाम बताता है.. और जिसे नाम बताया गया है उसे फिल्म का नाम अपनी टीम को इशारों में समझाना होता है.. बस इशारों को समझने की पॉवर आपमें होनी चाहिए..

जब हम पिछले साल अपने ऑफिस की तरफ से एनुअल ट्रिप के लिए जबलपुर (जबलपुर के ब्लोगरो से तो आप परिचित है हीदेखिये तस्वीर में जबलपुर का प्रसिद्द धुँआधार जल प्रपात, तस्वीर रोप वे से ली गई है ) गए थे तो पुरे रास्ते ट्रेन में हमने यही खेल खेला था.. और जब सुबह उठे तो हमारे पास के एक सज्जन ने कहा भाईसाहब कल रात मैंने फिल्मो के जो नाम सुने वो अपनी ज़िन्दगी में भी कभी नहीं सुने.. ऐसे ही एक नाम मेरे कुलीग मनोज (जिनकी साईट का बैनर आप मेरे ब्लॉग पर साइडबार में देख सकते है) ने दिया था.. उस फिल्म का नाम था हावडा ब्रिज पर लटकता खुनी खंज़र अब आप भी बताइए क्या ऐसी कोई फिल्म है ? पर हमने फिर भी बूझ लिया हमारे साथी की हरकतों से..

तो ये होती है बूझने की कला.. खैर बूझने की कला तो ये है मगर बुझाने की कला क्या? नहीं नहीं इशारों से लगने वाली आग को बुझाने कि कला नहीं पहेलिया बूझने की कला.. अरे नहीं फिर भटक गए आप.. ये ताऊ की पहेली नहीं वो तो बूझना अपने बस की बात नहीं.. ये तो वो पहेली जो हम बूझाते है और लोग बूझते है.. कुछ लोगो को तो एक बार में ही सब समझ में आ जाता है पर कुछ लोगो को समय लगता है.. किन्तु ये भी तो सही है की समय से पहले और भाग्य से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता.. एक कप कॉफी पी भी नहीं..

बूझने की बात होती ही रहती है प्रत्यक्षा जी पोस्ट में पूछती है तैमूर तुम्हारा घोड़ा किधर है ? अंकित अपने दोस्त के घर पर देखता है प्रत्यक्षा जी को तो पूछता है तैमूर घोड़ा युस करता था? वो तो लंगडा था ना? प्रत्यक्षा जी कहती है.. जी अंकित तैमूर लंगड़ा ही था , तभी घोड़ा चाहिये था . ओह आई सी टाइप का तो कोई रिप्लाई आता नहीं है अंकित की तरफ से.. पर उसके दोस्त को कोई बूझ नहीं पाता.. खुद अंकित भी नहीं..


पर इस दोस्त के घर पर और भी कई दोस्त मिलते है उनमे से कई तो ब्लोगर भी है.. उन ब्लोगर दोस्तों के भी और कई दोस्त होंगे बढती दोस्ती को देखते है तो कुछ धव्निया उत्पन्न होती सी प्रतीत होती है.. कुछ गुट गुट टाइप की आवाज़ आती है.. थोडी ही देर में घुट घुट में तब्दील हो जाती है.. और घुटने में दर्द होने लग जाता है कहते है जिसको भी दिल से तकलीफ होती है वो घुटने के दर्द से परेशान रहते है.. घुटने पर बाहर कोई जख्म लगा हो तो फिर भी मलहम लगा दे पर अन्दर से घुटने की तकलीफ का क्या किया जाए..

अब हमारे पास एक्स रे आईस तो है नहीं कि देख ले अन्दर झाँक कर क्या चल रहा है?

किलाईमेक्स का टाईम

अब किलाईमेक्स का टाईम आ गया है ठीक वैसे ही जैसे बर्खुर्दारो का किलाईमेक्स का टाईम आता है और वो पिक्चर ख़त्म कर देते है.. लेकिन शाहरुख़ खान के डायलोग पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त!’ की तर्ज पर उनके सिक्वल भी जल्दी आ जाते है.. पर ये किलाईमेक्स वैसा नहीं है ये चिटठा चर्चा वाला किलाईमेक्स है.. जब अनूप जी लिखते है अंत में.. और अंतत सब मोहित हो जाते है..

अनूप जी को मोहित करने की कला आती है.. उनकी एक लाईना से सीख कर तो जेंटलमैनत्व को प्राप्त नौजवान, संस्कारी और उर्जावान (ऐसा हम नहीं कहते Source देखिये) शिव कुमार मिश्र ने बाकायदा अनूप जी के नाम के साथ एक लाईना लिख मारी थी.. हमने तो पहले ही कहा था कि अपनी इन एक लाईना का पेटेंट करवा लीजिये पर उन्होंने अपने विवेक से काम नहीं लिया.. और देखिये ना कितनी बड़ा नुकसान हुआ.. आज हर कोई उनके फोर्मेट को चुराकर एक लाईना लिख रहा है.. यकीन ना हो तो हमारे टिपण्णी बक्से की तरफ आँख उठाकर देखिये एक लाईनों से भरा पड़ा है..



अबूझनदास की प्राचीन कालीन पहेलियों के भित्ति चित्र मिले है हमें.. कुछ कुछ समझने की कोशिश की पर समझ में नहीं आ रहा है सब कुछ उथल पुथल .. समझने बैठो तो चक्कर खाकर नीचे गिर जाओ.. पता नहीं किस युग की है.. लेकिन सुलझेगी इसी युग में.. ये इस के पीछे की तरफलिखा हुआ है की ब्लॉग सभ्यता के उदय में एक पहेली युग आएगा.. तब इस पहेली का हल निकलेगा.. आप ही देखिये आपको क्या समझ में आता है.


नोट: इस पूरी मिस्ट्री को सुलझाने के लिए जरुरी है कि आप एक भी शब्द ना छोडे क्योंकि हर शब्द की कड़ी कही ना कही दुसरे शब्द से जुडी है.. पुरे ध्यान से ठंडे दिमाग से पढ़ते हुए सुलझाने की कोशिश करे.. अगर आप एक सच्चे ब्लोगर है तो इसे ज़रूर सुलझा लेंगे.. तो आइये देखे क्या लिखा है इस पहेली में..

यह एक फिल्म नहीं मगर इसमें कुछ पात्र तो है क्या करे अगर वो काल्पनिक नहीं है तो.. नाम न ले.. इशारों में समझा दे.. उस दौर में चले जाये जब लोगो के पास भाषा नहीं थी इशारों इशारों में बाते होती थी.. नहीं मैं किसी प्रेमी युगल के बारे में बात नहीं कर रहा उनसे मुझे पूरी सहानुभूति है मैंने खुद भी कई बार अपने सीधे हाथ की ऊँगली को उल्टे हाथ की कलाई पर लगाते हुए फिर सीधे हाथ की उंगलियों से पांच बजाते हुए इशारे किये है.. मगर ये वो इशारा नहीं है.. नहीं नहीं ये बी इशारा भी नहीं.. जिनकी फिल्म कभी आपने देखी हो.. ये तो इशारों इशारों में होने वाली बातो की बात है..

क्या कहा आपको नहीं पता? हे संकट मोचन काहे ब्लोगर बनाया इनको?? ब्लोगर होकर भी यदि इशारों को नहीं समझो तो नालत है आप पर.. यहाँ पर इशारों इशारों पर पोस्ट लिखी जाती है.. इशारों इशारों में नाम ले लिया जाता है.. जिसको इशारा किया है वो इशारा समझ कर अपने ब्लॉग पर इशारा करने वाले की तरफ इशारा करते हुए पोस्ट लिख देते है.. देखिये न कैसे इशारों इशारों में बात हो जाती है और हम बूझ ही नहीं पाते की लफडा क्या था..

हालाँकि बूझने के मामले में हमारा भी कोई जवाब नहीं.. जब भी हम जोधपुर में अपने भाई बंधुओ के साथ होते है तो हमारा प्रिय खेल डम्ब शराज खेलते है.. ये खेल तो हमारे डा. अनुराग का भी फेवरेट है उन्होंने तो अपने साहबजादे आर्यन (अगला आमिर खान वही है.. क्या पता आमिर से दुगुना हो.. वो क्या है कि आजकल दुगुने का ही ज़माना है ) के जन्मदिन की पार्टी में भी बच्चो को डम्ब शरज ही खिलाया था.. नहीं नहीं खाने में नहीं जी.. ये तो खेल खिलाने वाला खाना है.. बाकी खाना तो बच्चो ने शानदार खाया था.. पर उसके विषय में फिर कभी.. हम डम्ब शरज पर आते है.. दो टीम बनती है हर टीम के एक बन्दे को दूसरी टीम का बंदा एक फिल्म का नाम बताता है.. और जिसे नाम बताया गया है उसे फिल्म का नाम अपनी टीम को इशारों में समझाना होता है.. बस इशारों को समझने की पॉवर आपमें होनी चाहिए..

जब हम पिछले साल अपने ऑफिस की तरफ से एनुअल ट्रिप के लिए जबलपुर (जबलपुर के ब्लोगरो से तो आप परिचित है ही… देखिये तस्वीर में जबलपुर का प्रसिद्द धुहाधार जल प्रपात, तस्वीर रोप वे से ली गई है ) गए थे तो पुरे रास्ते ट्रेन में हमने यही खेल खेला था.. और जब सुबह उठे तो हमारे पास के एक सज्जन ने कहा भाईसाहब कल रात मैंने फिल्मो के जो नाम सुने वो अपनी ज़िन्दगी में भी कभी नहीं सुने.. ऐसे ही एक नाम मेरे कुलीग मनोज (जिनकी साईट का बैनर आप मेरे ब्लॉग पर साइडबार में देख सकते है) ने दिया था.. उस फिल्म का नाम था हावडा ब्रिज पर लटकता खुनी खंज़र अब आप भी बताइए क्या ऐसी कोई फिल्म है ? पर हमने फिर भी बूझ लिया हमारे साथी कि हरकतों से..

तो ये होती है बूझने की कला.. खैर बूझने की कला तो ये है मगर बुझाने की कला क्या? नहीं नहीं इशारों से लगने वाली आग को बुझाने कि कला नहीं पहेलिया बूझने की कला.. अरे नहीं फिर भटक गए आप.. ये ताऊ की पहेली नहीं वो तो बूझना अपने बस की बात नहीं.. ये तो वो पहेली जो हम बूझाते है और लोग बूझते है.. कुछ लोगो को तो एक बार में ही सब समझ में आ जाता है पर कुछ लोगो को समय लगता है.. किन्तु ये भी तो सही है की समय से पहले और भाग्य से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता.. एक कप कॉफी पी भी नहीं..

बूझने की बात होती ही रहती है प्रत्यक्षा जी पोस्ट में पूछती है तैमूर तुम्हारा घोड़ा किधर है ? अंकित अपने दोस्त के घर पर देखता है प्रत्यक्षा जी को तो पूछता है तैमूर घोड़ा युस करता था? वो तो लंगडा था ना? प्रत्यक्षा जी कहती है.. जी अंकित तैमूर लंगड़ा ही था , तभी घोड़ा चाहिये था . ओह आई सी टाइप का तो कोई रिप्लाई आता नहीं है अंकित की तरफ से.. पर उसके दोस्त को कोई बूझ नहीं पाता.. खुद अंकित भी नहीं..

पर इस दोस्त के घर पर और भी कई दोस्त मिलते है उनमे से कई तो ब्लोगर भी है.. उन ब्लोगर दोस्तों के भी और कई दोस्त होंगे बढती दोस्ती को देखते है तो कुछ धव्निया उत्पन्न होती सी प्रतीत होती है.. कुछ गुट गुट टाइप की आवाज़ आती है.. थोडी ही देर में घुट घुट में तब्दील हो जाती है.. और घुटने में दर्द होने लग जाता है कहते है जिसको भी दिल से तकलीफ होती है वो घुटने के दर्द से परेशान रहते है.. घुटने पर बाहर कोई जख्म लगा हो तो फिर भी मलहम लगा दे पर अन्दर से घुटने की तकलीफ का क्या किया जाए..

अब हमारे पास एक्स रे आईस तो है नहीं कि देख ले अन्दर झाँक कर क्या चल रहा है?

किलाईमेक्स का टाईम

अब किलाईमेक्स का टाईम आ गया है ठीक वैसे ही जैसे बर्खुर्दारो का किलाईमेक्स का टाईम आता है और वो पिक्चर ख़त्म कर देते है.. लेकिन शाहरुख़ खान के डायलोग पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त!’ की तर्ज पर उनके सिक्वल भी जल्दी आ जाते है.. पर ये किलाईमेक्स वैसा नहीं है ये चिटठा चर्चा वाला किलाईमेक्स है.. जब अनूप जी लिखते है अंत में.. और अंतत सब मोहित हो जाते है..

अनूप जी को मोहित करने की कला आती है.. उनकी एक लाईना से सीख कर तो जेंटलमैनत्व को प्राप्त नौजवान, संस्कारी और उर्जावान (ऐसा हम नहीं कहते Source देखिये) शिव कुमार मिश्र ने बाकायदा अनूप जी के नाम के साथ एक लाईना लिख मारी थी.. हमने तो पहले ही कहा था कि अपनी इन एक लाईना का पेटेंट करवा लीजिये पर उन्होंने अपने विवेक से काम नहीं लिया.. और देखिये ना कितनी बड़ा नुकसान हुआ.. आज हर कोई उनके फोर्मेट को चुराकर एक लाईना लिख रहा है.. यकीन ना हो तो हमारे टिपण्णी बक्से की तरफ आँख उठाकर देखिये एक लाईनों से भरा पड़ा है..

अब मुद्दे से भटक कर बढ़ने वाले विवाद की तरह मेरी पोस्ट के बढ़ने से पहले ही हम खिसक लेते है.. आप बूझने में एक्सपर्ट है या नहीं ये तो आज इसे बूझ कर ही पता चलेगा.. बहुत बड़ी मिस्ट्री है कोई तगड़ा मिस्त्री चाहिए इसे सुलझाने के लिए.. जो भी आपको समझ में आये टिपण्णी में लिखिए.. हम इन्तेज़ार करते है.. और हाँ मिस्ट्री सुलझाते सुलझाते कही ख़ुद मत उलझ जाइयेगा..

जब देर रात तक
खामोशी बैठी
रही थी.. उस कमरे में
तुमने भी एक
नमी महसूस क़ी
होगी अपने सीने पर
एक दूसरे से लिपट कर
कितना रोए थे ना हम…


प्रेका मतलब सिर्फ़ पाना ही तो नही होता.. दे जाने में जो प्यार है उसकी खुमारी तो सांसो में घुल जाती है.. इतनी कोमल जैसे रूही का कोई फ़ाहा ले रखा हो हाथो में.. बस उसी को भिगो कर अपनी आँखो से सहला दे कोई गालो को तो ऐसा लगता है जैसे रेत हिचकोले खाती हुई बह रही है किनारों पर आती जाती हुई लहरो के संग.. बस उन्ही लहरो के साथ प्रेम के समंदर में डूब जाने का जो मज़ा है.. वो डिज्नीलैंड के रोलर कोस्टर में बैठकर भी नही पाता..

पर ये मज़ा और ये रोमांच सबको नही मिलता.. कुछ लोगो का किरदार बहुत छोटा होता है ज़िंदगी में.. हम खींचते रहते है.. धागे को.. वो ख़त्म ही नही होता.. फिर एक दिन लगता है अब खींचने से कुछ होगा नही. तो चलते चलते मुड जाते है किसी अलग मोड़ से.. फिर उस पर चलना भी तो ज़िंदगी है.. और जब चलते चलते कही ठहरते है तो पुरानी राह क़ी याद भी जाती है.. अब जो सांसो में घुला है.. प्यार तो उसमे भी है पर दो चार बूंदे मलाल क़ी दिख जाती है…

पता है जब घर
पहुँची तो एक
पायल वही छोड़ आई
अब एक पायल लेकर
घूमती हू पाँव में
काश क़ी वो पायल
मैं भूल आती नही
ये जोड़ी तो सलामत रहती..

 

जुलाई 2009
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