“कुश की कलम”

मेरे बारे में

इक रोज़ अचानक कुछ शब्द जमी पर गिर पड़े..मैने उठाकर उन्हे जेब में रख लिया और चलता रहा.. सोचा किसी ज़रूरतमंद को दे दूँगा.. और दिए भी पर देखिए ना जितने दिए बढ़ते ही गये.. अब भी बढ़ते जा रहे है.. जब भी जेब से कुछ निकालता हू ये शब्द भी साथ आ जाते है..कभी ग़ज़ल बन जाते है कभी नज़्म कभी कविता और कभी ना जाने क्या..मैं क्या कहु अपने बारे में.. ये शब्द कभी मिलकर कुछ कह दे तो यहा लिख दूँगा..तब तक के लिया इतना जान लीजिए की मैं

कुश हू…बस एक खूबसूरत ख्याल

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