“कुश की कलम”

Archive for October 2007

"शिथिल मैं शिथिल मॅन"

Posted by: bhaikush on: October 10, 2007

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शिथिल मैं शिथिल मॅनउड़ रहा जैसे क्टी पतंगना लक्ष्य है ना आस हैना हिम्मत ना प्रयास हैदेखता हू दूर बहुतक्षितिज़ के उस पार तकधूल है बस धूल है..ना बूझ सके वो प्यास हैक़दम जमे ज़मीन परना इनमे कोई जान हैथमते है ठहरते हैना जाने कहा प्राण हैभविष्या को देखतीनज़र है इक आँख हैझूलती डगर परटूटती [...]

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नया नया कमरा लिया थासामने वाला घर आज भी याद हैजहा वो रहती थी..नर्म मुलायम पँखो वालीपरी मैं जिसको कहता था..
खिड़की में आती थी औरसुखाती थी अपने बालो कोमैं उसके बालो से गिरती बूंदो की ठंडकअपने गालो पर पाता था..
ना चाहते हुए भीनज़र उस ओर मूड जाती थीकिताब हाथ में लिएचश्मा नाक पर रहता था
ना [...]

—— फ़ैसला ——–

Posted by: bhaikush on: October 10, 2007

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तमाम गवाहो ओरसबूतो केमद्देनज़र और लगे रहोमुन्नाभाई की लोकप्रियताको देखते हुए..समाज के हर वर्ग मेंगाँधिगिरी के सफलतापूर्वक प्रचलनहोने से ये अदालतइस नतीज़े परपहुँचती है.. की गाँधी नामकविचार अभी मरा नही है..केवल देह मात्रको ख़तम करने से..विचार ख़तम नहीहोता.. गाँधी एक विचार है..जो अभी भीज़िंदा है… इसलिए ये अदालत..मुज़रिमनाथुराम गोड-से को बा-इज़्ज़त बारी [...]

सुबह सोकर उठा तोहैरान रह गया..जहा भी जाता हू लोग एक दूसरेको कह रहे है..सलाम नाथुराम! सलाम नाथुराम
मैं घर में घुस जाता हूदरवाज़े खिड़किया सबबंद कर लेता हू.. छुप जाता हूबाथरूम मैं दरवाज़ाबंद करके.. आईने में मुझेफिर नज़र आता है नाथुराम..
घर की सारी दीवारो पर..नाथुराम की तस्वीरे है.टीवी में नाथुराम,, अख़बार मेंनाथुराम.. मुझे पागल बनादिया [...]

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छू लेते है लब तेरी आँख का पानीजब शर्म से इनमे नमी आ जाती है
थाम लेते है कलाई बड़े यकीन के साथजब उमीदो की थोड़ी कमी आ जाती है
तुम जो साथ हो तो ज़िंदगी जन्नत हैवरना अक्सर इसमेें गमी आ जाती है
तमन्ना है पनाह मिल जाए तेरे क़दमो मेंमगर वहा भी बेरहम ज़मी आ जाती [...]

बादल मानते नहीबरस जाते है चुपके सेइन्हे तेरी यादो मेंरोना अच्छा लगता है
पेडो की डालिया झूम जाती हैअक्सर हवाओ मेंइन्हे तेरे ख़्यालो मेंख़ुश होना अच्छा लगता है
समंदर हो जाता है चुपशाम के कद्म रखते हीइसे तेरे ख्वाब देखते हुएसोना अच्छा लगता है
सूरज बैठ जाता है चुपचाप आकरसुबह सुहानी पहाड़ी के पीछेइसे तेरे आने की ताकीद [...]

"शिथिल मैं शिथिल मॅन"

Posted by: bhaikush on: October 10, 2007

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शिथिल मैं शिथिल मॅनउड़ रहा जैसे क्टी पतंगना लक्ष्य है ना आस हैना हिम्मत ना प्रयास हैदेखता हू दूर बहुतक्षितिज़ के उस पार तकधूल है बस धूल है..ना बूझ सके वो प्यास हैक़दम जमे ज़मीन परना इनमे कोई जान हैथमते है ठहरते हैना जाने कहा प्राण हैभविष्या को देखतीनज़र है इक आँख हैझूलती डगर परटूटती [...]

"आज शाम फिर वही गुज़ारी"

Posted by: bhaikush on: October 10, 2007

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आज शाम फिर वही गुज़ारीसुखी टहनियो के नीचेजहा कभी तुम्हारी गोद मेंसर मेरा रखा होता था
तुम तिनका डालकर कानोमें मेरे सताती थीमेरे हाथ मैं तुम्हाराहाथ रखा होता था…
दोनो देखते रहते आसमानसे गिरते हुए सूरज कोअंधेरा जल भुन कर माथेपर आ चुका होता था
उठकर चल देते थे हमहाथो में हाथ लिएतुम्हारा सर मेरेकाँधे पर होता था
हर [...]

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नया नया कमरा लिया थासामने वाला घर आज भी याद हैजहा वो रहती थी..नर्म मुलायम पँखो वालीपरी मैं जिसको कहता था..
खिड़की में आती थी औरसुखाती थी अपने बालो कोमैं उसके बालो से गिरती बूंदो की ठंडकअपने गालो पर पाता था..
ना चाहते हुए भीनज़र उस ओर मूड जाती थीकिताब हाथ में लिएचश्मा नाक पर रहता था
ना [...]

—— फ़ैसला ——–

Posted by: bhaikush on: October 10, 2007

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तमाम गवाहो ओरसबूतो केमद्देनज़र और लगे रहोमुन्नाभाई की लोकप्रियताको देखते हुए..समाज के हर वर्ग मेंगाँधिगिरी के सफलतापूर्वक प्रचलनहोने से ये अदालतइस नतीज़े परपहुँचती है.. की गाँधी नामकविचार अभी मरा नही है..केवल देह मात्रको ख़तम करने से..विचार ख़तम नहीहोता.. गाँधी एक विचार है..जो अभी भीज़िंदा है… इसलिए ये अदालत..मुज़रिमनाथुराम गोड-से को बा-इज़्ज़त बारी [...]