“कुश की कलम”

Archive for January 2008

ज़मीर

Posted by: bhaikush on: January 24, 2008

जो भी उसके साथी थे दफ़्तर में..सब नही रहे..बस वो ही बचा था मेरी छोटी मोटी लड़ाई तो अक्सर उस सेहोती थी..और वो जीत भी जाता थामगर बात तब और थीतब उसके औरभी साथी [...]

यादो की दराज

Posted by: bhaikush on: January 24, 2008

——–
यादो की दराज जो खोलीएक पुराना कॅलंडर मिलाउंगलियो की आहट सेकुछ दिन गिर पड़े..मैने उठा कररख लिए हथेली पर..और छाँटने लगा
महकते हुए दिनो कोअचानक एक दिनलिपट गया उंगली सेमैने झटका..मगर फिर भी अटकारहा हाथ कीरेखाओ से..मानो कह रहा होसाथ ले चलो मुझे कीमैं सबसे खूबसूरत दिन हूतुम्हारी ज़िंदगी का..
तुम्हे याद नहीतुम बहुत छोटे [...]

ज़मीर

Posted by: bhaikush on: January 24, 2008

जो भी उसके साथी थे दफ़्तर में..सब नही रहे..बस वो ही बचा था मेरी छोटी मोटी लड़ाई तो अक्सर उस सेहोती थी..और वो जीत भी जाता थामगर बात तब और थीतब उसके औरभी साथी [...]

यादो की दराज

Posted by: bhaikush on: January 24, 2008

——–
यादो की दराज जो खोलीएक पुराना कॅलंडर मिलाउंगलियो की आहट सेकुछ दिन गिर पड़े..मैने उठा कररख लिए हथेली पर..और छाँटने लगा
महकते हुए दिनो कोअचानक एक दिनलिपट गया उंगली सेमैने झटका..मगर फिर भी अटकारहा हाथ कीरेखाओ से..मानो कह रहा होसाथ ले चलो मुझे कीमैं सबसे खूबसूरत दिन हूतुम्हारी ज़िंदगी का..
तुम्हे याद नहीतुम बहुत छोटे [...]

…. फुर्सत वाली चाय…..

Posted by: bhaikush on: January 12, 2008

फुर्सत वाली चाय
या यही कहता था मैं..सुरम्यी शाम जब गुनगुनातीहुई आती थी घर हमारे….कभी ऑफीस से घर जल्दी आतातब मिलती थी…. फुर्सत वाली चाय..
मेरी उंगलिया चाय के प्याले से ज़्यादातुम्हारी गर्माहट से गरमहो जाती थी.. तुम बिठाकर मुझेआराम कुर्सी पर.. मेरी गोद मेंबैठ जाती थी.. और तुम्हारी सांसोकी खुसबू चाय में मिल जाती थीै..क्या खूब [...]

…. फुर्सत वाली चाय…..

Posted by: bhaikush on: January 12, 2008

फुर्सत वाली चाय
या यही कहता था मैं..सुरम्यी शाम जब गुनगुनातीहुई आती थी घर हमारे….कभी ऑफीस से घर जल्दी आतातब मिलती थी…. फुर्सत वाली चाय..
मेरी उंगलिया चाय के प्याले से ज़्यादातुम्हारी गर्माहट से गरमहो जाती थी.. तुम बिठाकर मुझेआराम कुर्सी पर.. मेरी गोद मेंबैठ जाती थी.. और तुम्हारी सांसोकी खुसबू चाय में मिल जाती थीै..क्या खूब [...]

कंपन्न….

Posted by: bhaikush on: January 5, 2008

~~~
थोड़ी सी नमीबारिश के बाद काँचपर ठहरी बूंदो कीतरह मेरी पेशानी परठहर गयी थी..और साँसे उलझ पड़ीसांसो से.. धो-कनी जैसादिल धड़का.. पलको के दुशालेओढ़ कर आँखे बंदहो गयी .. ..समंदर की लहरो की तेज़ आवाज़एक साथ तीन तीनहवाई जहाज़ जैसे गुज़रे होउपर से.. सीने की पटरीपर दौड़ती तेज़ साँस..नाभि से ठीक [...]

……
यक़ीन नही आताकोई दूध लेते वक़्तइतना ख़ूबसूरत कैसेलग सकता है…साला !! सिर्फ़ दूध लेते वक़्त…
तुमने कहा तो रुकोदूध लेना है..और मेरी बाइक से उतरीठीक उस मध्यम गति सेजैसे साँझ ढले.. सूरजउतरता है पहाड़ी के पीछे
उंगली और अंगूठे मेंदो पाँच पाँच के सिक्के दबाएतुम काउंटर पर जा खड़ी हुईपता नही दुकान [...]

~~~ पतंग ~~~

Posted by: bhaikush on: January 5, 2008

रोज़ गगन में हज़ारो पतंग
के साथ वो भी उड़ती थी..लहराती मचलती.. आसमानो सेबातें करती हुई…
इक डोर थी जो उसको थामे रखती थीडोर से बंधी वो पतंग..उँचइयो में गोते लगा करलौट आती थी…
इक शाम एक एक कर सारीपतंगे उतर गयी थी…इक्का दुक्का पतंगे थीऔर वो भी बहुत दूर..
अचानक कही से एक पतंग [...]

कौन कहता है इफ़लासी मिट गयी दुनिया सेजिस्म पर गहरी कोडो की मार अब भी है
कहता है कोई दोस्ती हो गयी दोनो मेंैं अबमगर चोटी पर खड़ी इक दीवार अब भी है
कोई कहता है राम का नाम बेमानी है……….पर होता यहा दीवाली का त्योहार अब भी है
ज़माने की रफ़्तार ने पकड़ी है [...]