“कुश की कलम”

~~~ पतंग ~~~

Posted by: bhaikush on: March 15, 2008


रोज़ गगन में हज़ारो पतंग

के साथ वो भी उड़ती थी..
लहराती मचलती.. आसमानो से
बातें करती हुई…

इक डोर थी जो उसको थामे रखती थी
डोर से बंधी वो पतंग..
उँचइयो में गोते लगा कर
लौट आती थी…

इक शाम एक एक कर सारी
पतंगे उतर गयी थी…
इक्का दुक्का पतंगे थी
और वो भी बहुत दूर..

अचानक कही से एक पतंग आई
काले माँझे वाली…
उसके इरादे कुछ नेक नही लगे
वो गोते खाने लगी..

पतंग उलझ पड़ी काले
माँझे से.. पूरा दम लगाया
डोर ने भी हिम्मत ना हरी
काले माँझे से पतंग को छुड़ाया

काल माँझा भी कहा हारता
फिर से लौटा… और ऊपर गिरा पतंग के
.. बेचारी पतंग दर्द से
छ्ट-पटा उठी..

रोई, गिदगिड़ाई, मगर काले माँझे
का दिल नही पिघला..
लहुलुहान सी पतंग हो गयी बेचारी
और अपनी हिम्मत हारी..

थकि प्यासी.. निढाल सी
हो चली थी.. वो पतंग
शाम की सर्द हवाओ में
कोयले सी जली थी….

जिसके भरोसे ऊँची उड़ान भरी थी
वो डोर तो कब की टूट चुकी थी..
काले मॅन के मांझो की दुनिया में
एक और पतंग लूट चुकी थी…

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