Posted by: bhaikush on: March 15, 2008
फुर्सत वाली चाय
या यही कहता था मैं..
सुरम्यी शाम जब गुनगुनाती
हुई आती थी घर हमारे….
कभी ऑफीस से घर जल्दी आता
तब मिलती थी..
.. फुर्सत वाली चाय..
मेरी उंगलिया चाय के प्याले से ज़्यादा
तुम्हारी गर्माहट से गरम
हो जाती थी.. तुम बिठाकर मुझे
आराम कुर्सी पर.. मेरी गोद में
बैठ जाती थी.. और तुम्हारी सांसो
की खुसबू चाय में मिल जाती थीै..
क्या खूब होती थी वो..
फुर्सत वाली चाय..
तुम अंगूर की बेल जैसे.. झूल जाती
थी गर्दन पर मेरे.. और थाम लेती
मेरे हाथो को जैसे बारिश के बाद
पत्ते गिरती बूँदो को
थमा करते है..
और बिखेर देती थी मुस्कुराहट जैसे
सुबह बादलो में धूप..
बिखर जाती है.. और सितारे बिखर जाते
है जैसे रात में…
तुम नही जानती थी की..
तुम्हारी एक मुस्कुराहट.. ना जाने
कितनी गुड की डलियो सी मिठास ..
घोल जाती थी मेरी निगाओ में..
ये मुस्कुराहट.. मेरी दिन भर की
थकान का ओवरकोट उतार कर..
टंगा देती थी चिन्ताओ के साथ
खूँटी पर..
जब तक प्याला ख़त्म नही होता
उस चाय का.. तुम मेरी सांसो से
अपनी साँसे उलझा के रखती थी बस..
और मैं इन्तेज़ार करता रहता
था हमेशा की.. कब
ऑफीस से जल्दी घर जाना होगा..
अब भी इन्तेज़ार है.. आज क्लिनिक
से जल्दी घर आया था.. बाल्कनी
मैं बहू को देखा..
छोटे के लिए चाय लाई थी..
और आसमान से बूंदे गिरने लगी
दो तीन बूंदे लबो
पर अभी भी रुकी हुई है..
लगता है अब तुम वहा से पिलाती हो मुझे
…. फुर्सत वाली चाय
June 16, 2008 at 8:23 am
aaj laga ki batein bhool jati hain par yaadein yaad aati hai.
very good poem