“कुश की कलम”

Archive for October 2008

पन्ने हवा में अभी भी उड़ रहे थे..
उसने खिड़की बंद नही की… पता नही क्यो उसे आज सुबह से ही लगा था कोई तूफान आने वाला है.. तेज़ हवा का एक बदतमीज़ झोंका खिड़की को खोलते हुए अंदर तक आ गया…
पन्ने हवा में अभी भी उड़ रहे थे…
उसकी नज़रे मोबाइल पर टिकी थी.. फिर [...]

… फुर्सत वाली चाय …

Posted by: bhaikush on: October 15, 2008

फुर्सत वाली चाय
हाँ यही तो कहता था मैं..सुरम्यी शाम जब गुनगुनातीहुई आती थी घर हमारे….कभी ऑफीस से घर जल्दी आतातब मिलती थी..
.. फुर्सत वाली चाय..
मेरी उंगलिया चाय के प्याले से ज़्यादातुम्हारी गर्माहट से गरमहो जाती थी.. तुम बिठाकर मुझेआराम कुर्सी पर.. मेरी गोद मेंबैठ जाती थी.. और तुम्हारी सांसोकी खुशबु चाय में मिल जाती थी..
क्या [...]

… फुर्सत वाली चाय …

Posted by: bhaikush on: October 15, 2008

फुर्सत वाली चाय
हाँ यही तो कहता था मैं..सुरम्यी शाम जब गुनगुनातीहुई आती थी घर हमारे….कभी ऑफीस से घर जल्दी आतातब मिलती थी..
.. फुर्सत वाली चाय..
मेरी उंगलिया चाय के प्याले से ज़्यादातुम्हारी गर्माहट से गरमहो जाती थी.. तुम बिठाकर मुझेआराम कुर्सी पर.. मेरी गोद मेंबैठ जाती थी.. और तुम्हारी सांसोकी खुशबु चाय में मिल जाती थी..
क्या [...]

ठक ठक ठक!ठक ठक ठक!
शहर की बदनाम गलियो में सुबह के आठ बजे कोई दरवाजा खटखटा रहा है.. अंदर से किसी आदमी की आवाज़ आई..
कौन है सुबह सुबह?
जी वो..
क्या है भई?
जी वो यहा पर..
क्या यहा पर?
यहा पर लड़किया….
अरे बाबूजी सुबह सुबह मस्ती सूझ रही है..
नही दरअसल..
हा जी सब पता है हमको.. बोलिए
आपके यहा पर लड़किया..
अरे [...]

तमाम गवाहो ओरसबूतो केमद्देनज़र और लगे रहोमुन्नाभाई की लोकप्रियताको देखते हुए..समाज के हर वर्ग मेंगाँधिगिरी के सफलतापूर्वक प्रचलनहोने से ये अदालतइस नतीज़े परपहुँचती है.. की गाँधी नामकविचार अभी मरा नही है..केवल देह मात्रको ख़त्म करने से..विचार ख़त्म नहीहोता.. गाँधी एक विचार है..जो अभी भीज़िंदा है… इसलिए ये अदालत..मुज़रिमनाथुराम गोडसे को बा-इज़्ज़त बरी करती है …
———————–

कितनी [...]

तमाम गवाहो ओरसबूतो केमद्देनज़र और लगे रहोमुन्नाभाई की लोकप्रियताको देखते हुए..समाज के हर वर्ग मेंगाँधिगिरी के सफलतापूर्वक प्रचलनहोने से ये अदालतइस नतीज़े परपहुँचती है.. की गाँधी नामकविचार अभी मरा नही है..केवल देह मात्रको ख़त्म करने से..विचार ख़त्म नहीहोता.. गाँधी एक विचार है..जो अभी भीज़िंदा है… इसलिए ये अदालत..मुज़रिमनाथुराम गोडसे को बा-इज़्ज़त बरी करती है …
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कितनी [...]

ज़मूरे!
उस्ताद!
चूहे बिल्ली का खेल दिखाएगा?
दिखाएगा
सीधी सच्ची बात बताएगा
बताएगा!
एक तरफ होकर बोला तो ?
उस्ताद कान के नीचे लगाएगा!
शाबाश जमूरे. तो फिर शुरू हो जा.. पब्लिक आ गयी है.. अंकल, आंटी, बेबी, बाबा, हिंदू ,मुस्लिम, सिख, ईसाई सबको दुआ सलाम कर..
हिंदू को नमस्ते.. मुसलमान को सलाम.. ईसाई को वेलकम.. और सिख को सत श्री अकाल…
तो ज़मूरे
उस्ताद!
एक थी [...]