“कुश की कलम”

Archive for December 2008

उसकी धड़कने बहुत तेज़ी से बढ़ रही थी..
कही आज फिर बॉस ने रात को देर तक रोक लिया तो..? नही वो साफ़ कह देगी.. ऑफीस टाइम के बाद मैं नही रुक सकती.. पहले तो गर्मिया थी शाम देरी से होती थी पर अब नही अब अंधेरा जल्दी हो जाता है.. मगर वो बॉस को [...]

गर खाली बैठे है तो ऊब जाइए…वरना चुल्लू भर पानी में डूब जाइए..
उपरोक्त पंक्तियो का किसी भी व्यक्ति या घटना से कोई संबंध नही है.. और यदि है तो वो पूर्णतया काल्पनिक है..
अब चलते है आज की पोस्ट की तरफ..
“परिवर्तन प्रक्रति का नियम है” छोटा था तब पड़ोस के एक घर में पोस्टर पे लिखा [...]

देखिये न मैं भी कितना बेशर्म हूँ फ़िर आ गया हु अपनी पोस्ट लेकर..
आप लोग सोच रहे होंगे कि ये कुश साला रोज़ रोज़ अपने ब्लॉग पर कोई नयी पोस्ट लेकर आ जाता है.. और फिर हमे उसे ज़बरदस्ती पढ़ना पड़ता है.. फिर टिपियाना भी पड़ता है.. उपर से उसको पढ़ पढ़ कर बोर [...]

देखिये न मैं भी कितना बेशर्म हूँ फ़िर आ गया हु अपनी पोस्ट लेकर..
आप लोग सोच रहे होंगे कि ये कुश साला रोज़ रोज़ अपने ब्लॉग पर कोई नयी पोस्ट लेकर आ जाता है.. और फिर हमे उसे ज़बरदस्ती पढ़ना पड़ता है.. फिर टिपियाना भी पड़ता है.. उपर से उसको पढ़ पढ़ कर बोर [...]

वक़्त पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है.. ये तो सुना था.. लेकिन बेवक़्त कोई गधा ही किसी को अपना बेटा बना ले ये कभी ना देखा ना सुना…
खैर उपरोक्त पंक्तियो का मेरे इस लेख से कोई लेना देना नही.. किसी घटना, पात्र अथवा जीवित मृत, या शरीर से जीवित और [...]

वक़्त पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है.. ये तो सुना था.. लेकिन बेवक़्त कोई गधा ही किसी को अपना बेटा बना ले ये कभी ना देखा ना सुना…
खैर उपरोक्त पंक्तियो का मेरे इस लेख से कोई लेना देना नही.. किसी घटना, पात्र अथवा जीवित मृत, या शरीर से जीवित और [...]