“कुश की कलम”

Archive for January 2009

मुस्कुराहट उधारमिल सकती है क्या ??
सुबह सुबह एक सज्जन फोन पर कहने लगे..हम सकपकाए, भय्ये पहले ये तो बताओ की बोल कौन रिया है.. सामने से आवाज़ आई हम लल्लन लखनवी बोल रहे है.. वैसे तो हम ऐसे अंजान लोगो से बात नही करते पर जब लखनऊ का नाम जुड़ा था तो हम भी सोचे [...]

मुस्कुराहट उधारमिल सकती है क्या ??
सुबह सुबह एक सज्जन फोन पर कहने लगे..हम सकपकाए, भय्ये पहले ये तो बताओ की बोल कौन रिया है.. सामने से आवाज़ आई हम लल्लन लखनवी बोल रहे है.. वैसे तो हम ऐसे अंजान लोगो से बात नही करते पर जब लखनऊ का नाम जुड़ा था तो हम भी सोचे [...]

रेड लाइट.

Posted by: bhaikush on: January 15, 2009

रेड लाइट…
नही ये वो रेड लाईट एरिया नही जहाँ पर मजबूरिया कुछ जरूरतों से जद्दोजहद करती हो.. ये तो शहर के व्यस्त चौराहे पर लगी वो तीन लाईट है जहा इंसान कुछ देर के लिए ही सही पर रुकता है..
मैं भी रुकता हू.. मेरे पास में एक साइकिल रिक्शा खड़ा है.. जिसमे पीछे एक लड़का [...]

नए साल का पहला दिन है… मैं उनिंदी आँखो को मलते हुए उठता हू और दरवाज़ा खोलता हू.. कोई मेरे आँगन में पूरी दुनिया का बंडल बाँध कर फैंकता है.. मैं उसे उठाता हु.. ऊपर नज़र जाती है… सुबह सुबह फिर आसमान में किसी ने सोने का एक सिक्का रख दिया है..
कभी सोचा है की [...]