Posted by: bhaikush on: April 23, 2009
तारीख १३ अक्टूबर २००५ समय शाम ७ बजे
मैंने पापा के कमरे में जाकर कहा जयपुर जा रहा हूँ.. अब वही जॉब करूँगा..पापा ने पुछा कब ?मैंने कहा अभी ७.३० बजे की ट्रेन है..
मेरे दोस्त मुझे छोड़ने आये थे ट्रेन चल चुकी थी मैं अपने दोस्तों के साथ भाग रहा था प्लेटफोर्म पर.. वो ट्रेन एक [...]
Posted by: bhaikush on: April 23, 2009
तारीख १३ अक्टूबर २००५ समय शाम ७ बजे
मैंने पापा के कमरे में जाकर कहा जयपुर जा रहा हूँ.. अब वही जॉब करूँगा..पापा ने पुछा कब ?मैंने कहा अभी ७.३० बजे की ट्रेन है..
मेरे दोस्त मुझे छोड़ने आये थे ट्रेन चल चुकी थी मैं अपने दोस्तों के साथ भाग रहा था प्लेटफोर्म पर.. वो ट्रेन एक [...]
Posted by: bhaikush on: April 14, 2009
जिंदगी कब लाईफ बन गयी पता ही नहीं चला.. अभी थोडी देर पहले ही तो बचपन मुझे जवानी के घर छोड़ने आया था.. तब जो जीते थे, जिंदगी तो वही थी.. अब जो है उसे तो लोग बाग़ लाईफ कहते है.. पर फर्क दोनों में कुछ भी नहीं.. पहले हम इससे खेलते थे अब ये [...]
Posted by: bhaikush on: April 14, 2009
जिंदगी कब लाईफ बन गयी पता ही नहीं चला.. अभी थोडी देर पहले ही तो बचपन मुझे जवानी के घर छोड़ने आया था.. तब जो जीते थे, जिंदगी तो वही थी.. अब जो है उसे तो लोग बाग़ लाईफ कहते है.. पर फर्क दोनों में कुछ भी नहीं.. पहले हम इससे खेलते थे अब ये [...]
Posted by: bhaikush on: April 7, 2009
दस पैतालीस की आखिरी मेट्रो थी.. द्वारका से इन्द्रप्रस्थ की तरफ जा रहा था.. कैब आई नहीं थी तो मेट्रो ही लास्ट आप्शन था.. मैं ट्रेन में जाकर बैठ गया.. हाथ में राहेजा की किताब ‘एनिथिंग फॉर यु मेम थी.’ मैं किताब पढ़ रहा था.. जनकपुरी स्टेशन आया ट्रेन रुकी और फिर चल पड़ी.. [...]
Posted by: bhaikush on: April 7, 2009
दस पैतालीस की आखिरी मेट्रो थी.. द्वारका से इन्द्रप्रस्थ की तरफ जा रहा था.. कैब आई नहीं थी तो मेट्रो ही लास्ट आप्शन था.. मैं ट्रेन में जाकर बैठ गया.. हाथ में राहेजा की किताब ‘एनिथिंग फॉर यु मेम थी.’ मैं किताब पढ़ रहा था.. जनकपुरी स्टेशन आया ट्रेन रुकी और फिर चल पड़ी.. [...]
Posted by: bhaikush on: April 3, 2009
यह एक फिल्म नहीं मगर इसमें कुछ पात्र तो है क्या करे अगर वो काल्पनिक नहीं है तो.. नाम न ले.. इशारों में समझा दे.. उस दौर में चले जाये जब लोगो के पास भाषा नहीं थी इशारों इशारों में बाते होती थी.. नहीं मैं किसी प्रेमी युगल के बारे में बात नहीं कर रहा [...]
Posted by: bhaikush on: April 3, 2009
यह एक फिल्म नहीं मगर इसमें कुछ पात्र तो है क्या करे अगर वो काल्पनिक नहीं है तो.. नाम न ले.. इशारों में समझा दे.. उस दौर में चले जाये जब लोगो के पास भाषा नहीं थी इशारों इशारों में बाते होती थी.. नहीं मैं किसी प्रेमी युगल के बारे में बात नहीं कर रहा [...]
Posted by: bhaikush on: April 3, 2009
अबूझनदास की प्राचीन कालीन पहेलियों के भित्ति चित्र मिले है हमें.. कुछ कुछ समझने की कोशिश की पर समझ में नहीं आ रहा है सब कुछ उथल पुथल .. समझने बैठो तो चक्कर खाकर नीचे गिर जाओ.. पता नहीं किस युग की है.. लेकिन सुलझेगी इसी युग में.. ये इस के पीछे की तरफलिखा हुआ [...]
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