“कुश की कलम”

दिल की बात

कुछ बातें दिल की दिल मैं ही रह जाती है ! कुछ दिल से बाहर निकलती है कविता बनकर….. ये शब्द जो गिरते है कलम से.. समा जाते है काग़ज़ की आत्मा में…… ….रहते है हमेशा वही बनकर के किसी की चाहत, और उन शब्दो के बीच मिलता है एक सूखा गुलाब….. -कुश

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